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तेज बुखार आया, मुंह से खून आने लगा, अकेले इलाज करवाते रहे लेकिन घरवालों को नहीं बताया

आज हम दिल्ली एम्स के दो डॉक्टरों की कहानी बताने जा रहे हैं। दोनों कोरोना मरीजों का इलाज करते-करते खुद कोरोना से संक्रमित हुए। ठीक होने के बाद एक तो वापस कोरोना वॉर्ड में भी लौट आए, मरीजों का फिर इलाज करने।

पहली कहानी - डॉक्टर सुनील ज्याणी की, जो संक्रमित हुए, आईसीयू में इलाज चला, 10 किलो वजन कम हो गया, अब ड्यूटी पर लौटे

मैं 24 मार्च से ही कोरोना पेशेंट का ट्रीटमेंट कर रहा था। सात-सात दिन के रोटेशन में हमारी ड्यूटी हुआ करती थी। 29 मई को मुझे अचानक बुखार आ गया। कपकपी लगने लगी। कमजोरी बहुत ज्यादा आ गई। मैंने अनुमान लगा लिया था कि मैं कोरोना पॉजिटिव हो गया हूं। उस दिन मैंने 15 मिनट पहले ही अपनी ड्यूटी खत्म कर दी और तुरंत अपने रूम में चला गया।

उसी दिन रात में मुझे बहुत तेज ठंड लगी। घर राजस्थान में है। दिल्ली में एम्स के हॉस्टल में अकेला ही रहता हूं, इसलिए कोई देखने वाला नहीं था। सुबह होते ही मैंने डिपार्टमेंट में बताया कि ऐसे लक्षण हैं। उस दिन मेरा ब्लड लिया गया और दूसरे दिन रिपोर्ट निगेटिव आई। लेकिन, उस समय प्रोटोकॉल था कि यदि बुखार आया है तो 7 दिनों तक क्वारैंटाइन ही रहना है। इसलिए मैं क्वारैंटाइन ही था।

डॉक्टर सुनील ज्याणी ने बताया कि हम पीपीई किट पहनकर ड्यूटी करते हैं। सभी प्रिकॉशन ले रहे थे, फिर भी संक्रमण का शिकार हो गए।

क्वारैंटाइन के चौथे दिन मुझे बहुत तेज बुखार आया। कफ बनाना शुरू हो गया और बलगम में खून आने लगा। हालत ऐसी हो गई थी कि मैं खड़ा भी नहीं हो पा रहा था। साथियों ने मुझे तुरंत एम्स के ही कोविड वॉर्ड में एडमिट कर दिया। फिर मेरा दूसरा टेस्ट हुआ, जो पॉजिटिव आया। यह 4 जून की बात है।

अगले पांच से छ दिन मैं नॉर्मल रहा, लेकिन 11 जून आते-आते एक बार फिर लक्षण काफी ज्यादा बढ़ गए और मेरी सांस फूलने लगी। मेरी बॉडी में ऑक्सीजन का लेवल 91 पर आ गया था। यह बहुत ही गंभीर स्थिति होती है। इसके बाद मुझे तुरंत आईसीयू में शिफ्ट कर दिया गया। किस्मत से आईसीयू में ट्रीटमेंट मिलते ही मैं रिस्पॉन्स कर गया और आठ से दस घंटे में काफी रिलीफ मिला।

हॉस्पिटल में कलीग्स ही सुनील का सहारा थे, क्योंकि उन्होंने घर पर यह बात नहीं बताई थी।

इसके बाद मुझे आईसीयू से नॉर्मल वॉर्ड में शिफ्ट कर दिया गया क्योंकि बिना वजह आईसीयू वॉर्ड में रहना और ज्यादा खतरनाक हो जाता है। फिर 26 जून तक नॉर्मल वॉर्ड में ही रहा। कोरोना से जीतने में मुझे करीब 22 दिन लग गए। जब मैं कोरोना से संक्रमित हुआ था तो ये बात घर पर नहीं बताई थी। क्योंकि बताता भी तो वो लोग मुझसे मिल नहीं सकते थे।

उनका दिल्ली आना ज्यादा खतरनाक था, क्योंकि यहां तो बहुत कोरोना फैला हुआ था। डिस्चार्ज होने के दो दिन बाद 28 जून को मैं अपने घर पहुंचा। तभी घर में सबको बताया कि मैं कोरोना पॉजिटिव हो गया था और अब पूरी तरह से स्वस्थ हूं। मेरा करीब दस किलो वजन कम हो गया। पंद्रह दिन घर पर रेस्ट किया।

15 जुलाई से मैंने फिर ड्यूटी ज्वॉइन कर ली है। हालांकि, अभी कोरोना वॉर्ड में ड्यूटी नहीं है। मेरे पापा आर्मी से रिटायर हुए हैं, इसलिए वो छोटी-छोटी बातों से घबराते नहीं। उन्होंने कहा कि बिना डरे काम करो।

22 दिन लगातार ट्रीटमेंट के बाद सुनील कोरोना से ठीक हो सके। फिर अपने घर गए।

मुझे कभी कोरोना का डर नहीं रहा क्योंकि हमारे वॉर्ड में स्वाइन फ्लू, एचआईवी, हेपेटाइटिस तक के पेशेंट आते हैं, जिनका मोर्टेलिटी रेट कोरोना से ज्यादा है और संक्रमण का खतरा भी। हम पूरे प्रिकॉशन लेकर काम कर रहे हैं। कोरोना वॉर्ड में जब भी ड्यूटी लगेगी, मैं फिर करना चाहूंगा। वॉर्ड में ड्यूटी करने पर लगता है कि हम भी कोरोना वॉरियर हैं और कुछ अलग कर रहे हैं।

दूसरी कहानी - डॉक्टर प्रमोद कुमार की जो ठीक होकर दोबारा कोरोना वॉर्ड में मुस्तैद हो गए हैं

मैं 24 मार्च से ही एम्स के ट्रॉमा सेंटर के आईसीयू में पोस्टेड हूं। हर चौथे हफ्ते हमारी ड्यूटी हुआ करती है। कोरोना के क्रिटिकल पेशेंट्स को देखने की जिम्मेदारी हमारी होती है। हम पूरे प्रिकॉशन के साथ वॉर्ड में होते हैं। पीपीई किट पहने होते हैं। 7 घंटे तक कुछ खाना-पीना नहीं। 6 घंटे मरीजों के बीच होते हैं तो कोरोना संक्रमित होने की रिस्क तो होती ही है।

5 जुलाई को मुझे हल्का बुखार आया। उसी दिन मैंने जांच के लिए खून दिया। 8 जुलाई को मैं कोरोना पॉजिटिव आया। मेरा घर झारखंड में है। घर पर मां, पापा और बहन हैं। यहां पर एम्स के हॉस्टल में रहता हूं। घरवालों को बता दिया था, लेकिन सिंपटम्स माइल्ड थे, इसलिए ज्यादा टेंशन की बात नहीं थी। 10 दिनों तक मैं एम्स के वॉर्ड में आइसोलेशन में रहा।

ये डॉक्टर प्रमोद कुमार हैं। एम्स के हॉस्टल में ही रहते हैं। परिवार झारखंड में रहता है।

कोरोना ड्यूटी के बाद से ही मैंने बाहर जाना बंद कर दिया था। मार्च से कहीं नहीं गया। सिर्फ हॉस्टल और कोरोना वॉर्ड में ही आना-जाना होता था। मुलाकात भी सिर्फ कलीग्स के साथ ही होती थी। घर जानबूझकर नहीं गया क्योंकि अभी यहां ड्यूटी चल रही है। कोरोना वॉर्ड के अंदर हमें कम से कम ये पता होता है कि कौन कोरोना पॉजिटिव है। हम पूरे प्रिकॉशन के साथ जाते हैं।

वरना जिन लोगों को काम के सिलसिले में बाहर निकलना पड़ रहा है वो तो ये भी नहीं जानते कि कौन पॉजिटिव है और कौन नहीं। हालांकि, अभी मैं ठीक हो चुका हूं और ड्यूटी के लिए कोरोना वॉर्ड में वापस आ चुका हूं। वापस आने से पहले मैंने पढ़ा कि दोबारा संक्रमण का खतरा कितना होता है। यह कितना रिस्की हो सकता है, लेकिन इस बारे में ज्यादा कोई डाटा नहीं है तो मैं तो आ गया फिर ड्यूटी करने।

कोरोना वॉर्ड में मरीज चिढ़ने लगते हैं

कोरोना वॉर्ड में मरीजों का इलाज करने और खुद आइसोलेशन में रहने के दौरान हुए एक्सपीरियंस से पता चलता है कि जो वॉर्ड में या आइसोलेशन में होता है वो चिढ़ने लगता है। क्योंकि कोई मिलने-जुलने वाला नहीं होता। किसी से बात नहीं हो पाती। आईसीयू में तो मॉनिटर की आवाज आते रहती है। पीपीई किट पहनकर डॉक्टर आते रहते हैं। कई बार आपके आसपास ही किसी की डेथ भी हो जाती है, यह सब देखकर किसी का भी इरिटेट होना एक नॉर्मल बात है।

डॉक्टर प्रमोद कुमार कोरोना से लड़ने के बाद एक बार फिर ड्यूटी पर लौट चुके हैं।

आईसीयू में कई बार कुछ पेशेंट डेलिरियम में चले जाते हैं। यानी अपना होश खो बैठते हैं। ऐसा उन लोगों के साथ ज्यादा होता है जो मेंटली प्रिपेयर नहीं होते। मैं भी जब आइसोलेशन में था तो थोड़ा इरिटेट हो गया था। ऐसे में जरूरी है कि हम घरवालों से फोन पर ज्यादा से ज्यादा बात करते रहें। मोबाइल पर कुछ न कुछ करते रहें।

काम करने की कंडीशन है तो करें या फिर कुछ पढ़ते रहें। खुद को कहीं न कहीं व्यस्त रखना जरूरी है वरना कोरोना ट्रीटमेंट का ये पीरियड काटना बहुत मुश्किल हो जाता है। खैर, मैं अपनी ड्यूटी पर दोबारा लौट चुका हूं। घरवालों ने कहा था कि हो सके तो कोरोना के बजाए किसी दूसरे वॉर्ड में ड्यूटी लगवा लो, लेकिन अभी हम नई उम्र के हैं। हमें गंभीर संक्रमण होने की आशंका कम है। पूरे प्रिकॉशन लेते हुए इलाज कर रहे हैं।



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परिवार ने कहा कि, हो सके तो अब कोरोना वॉर्ड से ड्यूटी हटवा लो लेकिन डॉक्टर प्रमोद कुमार ने यह कहते हुए इंकार कर दिया कि, यह हमारी जिम्मेदारी है। पीछे नहीं हट सकते।


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