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100 साल पहले यहां यादवों-भूमिहारों के बीच गोलियां चलीं, दर्जनों मौतें हुई; असर आज भी

गांव के बाहर बड़ा सा पूजा पंडाल बना है। मेला लगा है। चाट-पकौड़ी से लेकर हर सामान बिक रहा है। इस मेले से थोड़ा आगे बढ़ने पर एक रास्ता दाईं तरफ मुड़ता है। मोड़ पर ही एक बड़ा सा गेट बना है। गेट पर कुछ लिखा नहीं हुआ है, लेकिन इसके बगल में प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना के तहत बनी सड़क पर लगे बोर्ड पर गांव का नाम लिखा है, लाखोचक।

लखीसराय शहर से करीब 8 किलोमीटर दूरी पर बसे इस गांव का एक इतिहास है। एक ऐसा इतिहास, जिसे बिहार के इतिहासकार पहली जातीय हिंसा की लड़ाई मानते हैं, लेकिन इलाके के लोग ‘युद्ध’ कहते हैं। बिहार का एक ऐसा इकलौता ‘युद्ध’ जो यहीं रहने वाले दो समुदायों के बीच हुआ। दो दिन तक चला। गोलियां चलीं। आठ से दस लोग मारे गए।

एक ऐसा ‘युद्ध’ जो अपनी जाति को सुरक्षित रखने के लिए किया गया। एक ऐसा ‘युद्ध’ जिसने राज्य में जातीय गोलबंदी को मजबूत कर दिया। एक ऐसा ‘युद्ध’ जिसने भूमिहार और यादव जैसी दो प्रमुख जातियों के बीच एक दूरी पैदा कर दी, जो आज भी चुनावों के वक्त साफ-साफ दिखती है।

इस संघर्ष के बारे में जो इतिहास की किताबों में दर्ज है, वो आपको आगे बताएंगे। अभी तो आप लाखोचक गांव में हुए विकास की कहानी सुनिए। यादव बहुल इस गांव तक आते ही सड़क उखड़ जाती है। प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना के तहत गांव में जो सड़क गई है और जिसका बोर्ड गांव के बाहर लगा है, वो दस दिन पहले ही बनी है। मुख्यमंत्री की सात निश्चय योजना के तहत हर घर तक पानी पहुंचाने के लिए नल लग गए हैं, लेकिन पानी नहीं आ रहा है।

अभी गांव में मेला लगा हुआ है। यह गांव लखीसराय से 8 किमी की दूरी पर है।

27 साल के सतीश कुमार यादव कहते हैं, “कैसा विकास? अपने गांव तक बिजली लाने के लिए हमने चंदा जमाकर के घूस दी। सड़क आप देख ही रहे हैं। लखीसराय से एकदम झकाझक सड़क आई है, लेकिन गांव से पांच सौ मीटर पहले ही खत्म हो गई। गांव के अंदर जाने वाली सड़क भी पूरी नहीं बनी है।”

पास ही खड़े 70 साल के सत्यनारायण प्रसाद यादव ने एक साथ कई सवाल उछाल दिए हैं, 'कुछ नहीं है गांव में। आप क्यों आए हैं? चुनाव खराब करने आए हैं क्या? किसने भेजा है?' ये सवाल केवल सत्यनारायण प्रसाद के नहीं हैं। कई लोग जानना चाह रहे हैं कि हमारे यहां आने की वजह क्या है। असल में ये यादव बहुल गांव है। इस गांव के आसपास स्थित दूसरे दस गांव भी यादव बहुल हैं।

गांव तक बहुत कम ही लोग आते हैं। सत्यनारायण यादव को हमने पूरी तसल्ली से अपने आने की वजह बताई, फिर भी वो संतुष्ट नहीं हुए। ये कहते हुए आगे बढ़ गए कि जिसने आपको भेजा है, उसे कह दीजिएगा कि हम लोग अबरी लालू यादव के लड़के को वोट देंगे। किसी के भेजने-वेजने से कुछ नहीं होगा।

लाखोचक गांव, लखीसराय जिले के सूर्यगढ़ा विधानसभा में आता है। 28 अक्टूबर को यहां वोट डाले जाएंगे। फिलहाल इस विधानसभा सीट पर राजद का कब्जा है। इस चुनाव में NDA की तरफ से यहां जदयू मैदान में है और सामने राजद है। जदयू के बागी उम्मीदवार जो अब लोजपा के चुनाव चिन्ह पर मैदान में हैं, जदयू उम्मीदवार के लिए मुश्किलें बढ़ा रहे हैं।

प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना का बोर्ड तो लगा है, लेकिन गांव में जाने के लिए पक्की सड़क नहीं है।

राजद विधायक और उम्मीदवार प्रह्लाद यादव अपने सहयोगी दलों कांग्रेस एवं वाम दल का समर्थन प्राप्त कर रहे हैं। जदयू उम्मीदवार रामानंद मंडल वीआईपी के सहारे चुनावी बैतरणी पार करने की जुगत में हैं। ऐसी खबर है कि यहां भाजपा के ज्यादातर कार्यकर्ता चुनावी कार्यक्रम से खुद को अलग रखे हुए हैं। वे यहां जदयू से बागी हुए लोजपा प्रत्याशी रविशंकर प्रसाद सिंह उर्फ अशोक सिंह का समर्थन कर रहे हैं।

आज इतने साल बाद लाखोचक में ऐसा कोई नहीं है, जो उस जातीय भिड़ंत की कहानी सुना सके। कोई नहीं है, जो बता सके कि तब क्या हुआ? क्यों हुआ था और क्या-क्या हुआ था? गांव में कुछ युवा और बुजुर्ग घटना के बारे में ये जरूर कहते हैं, हां…दादा बताते थे। युद्ध हुआ था। भूमिहार और यादवों में। कई दिनों तक चला था। इससे ज्यादा कुछ पता नहीं है।'

जिस कहानी को गांव वाले भूल गए हैं। जो किस्सा अब इन्हें ही याद नहीं, उसे इतिहास की किताबों ने सहेज कर रखा है। स्वतंत्र लेखक प्रसन्न चौधरी और पत्रकार श्रीकांत की किताब ‘बिहार सामाजिक परिवर्तन के कुछ आयाम’ में इस घटना का विस्तार से जिक्र है। साल था 1925। बिहार में निचली समझी जाने वाली जातियां एक जगह जुटती थीं और सभी एक साथ जनेऊ धारण करते थे। इसे बिहार में ऊंची समझी जाने वाली जातियों ने खुद के लिए एक चुनौती समझा। कई जगह पर छिटपुट घटनाएं हुईं, लेकिन सबसे बड़ी घटना 26 मई 1925 को लखीसराय के लाखोचक गांव में घटी।

गांव के लोगों का कहना है कि यहां कुछ काम नहीं हुआ है। न सड़क है न पानी। बिजली के लिए भी इन्हें खुद पैसा खर्च करना पड़ा था।

इस दिन जनेऊ धारण करने के लिए आसपास के कई गांवों से यादव बड़ी संख्या में यहां जुटे हुए थे। प्रसिद्ध नारायण सिंह इलाके के बड़े जमींदार थे और जाति से भूमिहार थे। वो इसके खिलाफ थे। उनके नेतृत्व ने करीब हजारों भूमिहारों ने यादवों पर हमला कर दिया। इस किताब में उस दिन की घटना कुछ यूं दर्ज है, 'उत्तर-पश्चिम दिशा से करीब 3000 बाभनों की भीड़ गोहारा बांधे बस्ती की तरफ बढ़ रही थी। हाथी पर अपने कुछ लोगों के साथ बैठे विश्वेश्वर सिंह भीड़ का नेतृत्व कर रहे थे। आजू-बाजू में घुड़सवार थे, जिसमें एक खुद जमींदार प्रसिद्ध नारायण सिंह थे। भीड़ लाठी, फरसा, गंडासा, तलवार और भाले से लैस थी।'

इस दिन पुलिस ने 118 राउंड फायरिंग की। पुलिस के सब इंस्पेक्टर और एसपी बुरी तरह घायल हुए। इस घटना में 8 से लेकर 80 लोगों के मारे जाने की बात कही जाती है। ऐसा माना जाता है कि लाखोचक की ये घटना बिहार के इतिहास में पहली जातीय हिंसा या जातीय आधार पर बड़े हमले जैसी घटना है। इस घटना ने राज्य की जातीय संरचना को, यहां की व्यवस्था को और आगे चलकर राजनीति को बहुत हद तक प्रभावित किया है। शायद यही वजह है कि आज सालों बाद भी बिहार की दो जातियां यादव और भूमिहार दो अलग-अलग छोर पर खड़ी दिखती हैं।



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करीब 100 साल पहले जातीय हिंसा के बारे में गांव के लोगों को ज्यादा जानकारी नहीं है। बस इतना जानते हैं कि हिंसा हुई थी।


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