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इस साल नासिक और गया में श्राद्ध कर्म नहीं होंगे, ब्रह्म कपाल की स्थिति स्पष्ट नहीं; उज्जैन में सोशल डिस्टेंसिंग के साथ पिंडदान-तर्पण

बुधवार, 2 सितंबर से 16 दिनी श्राद्ध पक्ष शुरू हो रहा है। इन दिनों में पितरों के लिए पिंडदान किया जाता है। हर साल पितृ पक्ष में बिहार के गया, महाराष्ट्र के नासिक, मध्यप्रदेश के उज्जैन और उत्तराखंड के ब्रह्म कपाल में लाखों लोग पिंडदान करने पहुंचते हैं। कोरोना के कारण इस साल हालात काफी बदले से हैं। श्राद्ध तर्पणादि के इन प्रमुख तीर्थों से रौनक गायब है।

श्राद्धपक्ष के 16 दिन इन तीर्थों के कई पुजारी परिवारों के लिए काफी महत्वपूर्ण होते हैं, क्योंकि इन्हीं 16 दिनों में सालभर की कमाई का एक बड़ा हिस्सा ये कमा पाते हैं। मार्च से तीर्थों में पिंडदान, श्राद्ध आदि बंद हैं। ऐसे में गया, ब्रह्मकपाल, उज्जैन और नासिक के सैंकड़ों पुजारी परिवारों के सामने आर्थिक संकट आ खड़ा हुआ है। इन तीर्थों में अभी क्या स्थिति है और 2 सितंबर से क्या होगा इस पर एक रिपोर्ट...

ये गया का तीर्थ क्षेत्र है। पितृ पक्ष में यहां श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है। लेकिन, इस साल पूरा क्षेत्र सुनसान है।
  • बिहारः गया में नहीं लगेगा पितृपक्ष मेला, ऑनलाइन करा सकते हैं पूजा

बिहार के गया क्षेत्र के तीर्थ पुरोहित पं. गोकुल दुबे ने बताया इस साल कोरोना की वजह से गया में लगने वाला मेला पूर्ण रूप से स्थगित है। इस संबंध में तीर्थ क्षेत्र के पुजारियों की प्रशासन से बात चल रही है। गया में पिंडदान और तर्पण आदि कर्म करने वाले लगभग 100 मुख्य परिवार हैं। इन परिवारों से जुड़े करीब 10 हजार पंडित हैं जो ये कर्म करवाते हैं। हर साल यहां 10 लाख से ज्यादा लोग श्राद्ध के 16 दिनों में तर्पण और पिंडदान के लिए आते हैं।

गया क्षेत्र में पंडितों के लिए ये ही कमाई का एकमात्र साधन है। पांच महीने से सबकुछ बंद है। मार्च में चैत्र मास का मेला चल रहा था, उसी समय से लॉकडाउन हो गया। तब से अब तक सब बंद होने से पंडितों को आर्थिक समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। पितृ पक्ष में मेला नहीं लगेगा तो स्थितियां और ज्यादा बिगड़ जाएंगी।

गया में मुख्य रूप से विष्णुपद, फल्गु नदी के किनारे, अक्षयवट के आसपास पिंडदान किया जाता है।

पं. दुबे ने बताया कि गया में सालभर में कभी भी पिंडदान कर सकते हैं। जो लोग अभी गया में पिंडदान नहीं कर पा रहे हैं, वे बाद में आकर भी कर सकते हैं। अभी कोरोना की वजह से अपने-अपने घर ही इससे संबंधित कर्म किए जा सकते हैं। यहां के कुछ पुजारी ऑनलाइन पिंडदान करवा रहे हैं। इसके लिए बकायदा वेबसाइट्स भी हैं, जिन पर पंडों के नाम, नंबर आदि मिल जाते हैं।

क्यों है गया श्राद्ध का सबसे बड़ा तीर्थ - पुराने समय में गयासुर नाम के दैत्य को देखने से या छूने से ही लोगों के पाप दूर जाते थे। ये स्थान उसी गयासुर के नाम पर प्रसिद्ध है। गयासुर का शरीर पांच कोस था। उसने इसी जगह पर देवताओं को यज्ञ के लिए अपना शरीर दिया था। यहां मुख्य रूप से फल्गु नदी, विष्णुपद मंदिर, नदी के किनारे अक्षयवट पर पिंडदान किया जाता है।

ये ब्रह्मकपाल का 2019 का फोटो है। इसमें पिंडदान करते दिख रहे हैं।
  • उत्तराखंडः ब्रह्म कपाल तीर्थ में अभी सब बंद, श्राद्ध पक्ष में क्या होगा स्पष्ट नहीं

उत्तराखंड में बद्रीनाथ धाम के पास अलकनंदा नदी के किनारे ब्रह्म कपाल तीर्थ क्षेत्र स्थित है। ब्रह्म कपाल तीर्थ पुरोहित अध्यक्ष पं. उमेश सती ने बताया कि हर साल पितृ पक्ष में देशभर से करीब एक लाख लोग पिंडदान करने यहां आते हैं। इस बार पिंडदान हो सकेंगे या नहीं, स्थिति स्पष्ट नहीं है। फिलहाल, यहां पिंडदान नहीं किए जा रहे हैं। तीर्थ पुरोहित प्रशासन से पूजन कर्म शुरू करने की मांग कर रहे हैं। अभी तक कोई निर्णय नहीं हो सका है।

ब्रह्म कपाल में 6 महीने में एक साल की कमाई की चुनौती - ब्रह्म कपाल तीर्थ में एक हजार पुजारियों के परिवार का जीवन श्राद्ध की दान-दक्षिणा से चलता है। दोहरी चुनौती ये है कि छह महीनों में ही पूरे साल की कमाई करनी होती है, क्योंकि 6 महीने यहां बर्फ जमी होने के कारण सब बंद होता है। इस बार कोरोना की वजह से हालात ज्यादा बिगड़ गए हैं, पूरा सीजन खत्म होने वाला है। अभी कुछ कमाई नहीं हुई तो सर्दियों में यहां सब बंद हो जाएगा और फिर पंडे-पुजारियों को मई 2021 तक इंतजार करना होगा।

ब्रह्मकपाल क्षेत्र में शिवजी को ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्ति मिली थी। इसीलिए यहां पिंडदान करने का विशेष महत्व है।

ब्रह्मकपाल क्यों खास है - मान्यता है प्राचीन समय में शिवजी ने अपने त्रिशूल से ब्रह्माजी का एक सिर काट दिया था। तब ब्रह्माजी का सिर त्रिशूल पर चिपक गया था। ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्ति के लिए शिवजी बद्रीनाथ के पास अलकनंदा नदी के किनारे पहुंचे। यहां त्रिशूल से ब्रह्मा का सिर मुक्त हो गया। तभी से ये स्थान ब्रह्म कपाल से प्रसिद्ध हो गया। पांडवों ने भी इस स्थान पर पितरों के लिए तर्पण किया था।

उज्जैन में पिंडदान आदि धर्म-कर्म करते समय में श्रद्धालु और पुजारी मास्क और सोशल डिस्टेंसिंग का ध्यान रख रहे हैं।
  • मध्य प्रदेशः उज्जैन में शुरू हो चुके हैं पिंडदान, लेकिन सोशल डिस्टेंसिंग जरूरी

मध्य प्रदेश के उज्जैन के सिद्धनाथ घाट के तीर्थ पुरोहित पं. राजेश त्रिवेदी के मुताबिक यहां पिंडदान और इससे संबंधित कर्म शुरू हो चुके हैं। श्राद्ध पक्ष में भी श्रद्धालु यहां पिंडदान करने आ सकते हैं। तय गाइड लाइन पर ही पिंडदान हो रहे हैं। यजमान और पुजारी मास्क लगाकर, सोशल डिस्टेंसिंग के साथ विधान पूरा कर रहे हैं। घाटों पर सैनेटाइजेशन किया जा रहा है। इस समय में शिप्रा नदी में स्नान करना वर्जित है, तो ट्यूबवेल से स्नान कराया जा रहा है। ठहरने के लिए होटल्स और धर्मशालाएं भी खुल चुके हैं। इस वजह से लोगों को यहां रहने में पिंडदान करवाने में परेशानी कम है। हर साल यहां करीब 2 लाख से ज्यादा लोग पितृपक्ष में आते हैं।

जिस तरह गया में अक्षयवट है, उसी तरह उज्जैन में सिद्धवट है। यहां भैरवगढ़ क्षेत्र में सिद्धवट घाट पर पिंडदान आदि धर्म-कर्म किए जाते हैं।

करीब 3 हजार से ज्यादा हैं पुजारी परिवार - घाट क्षेत्र में पिंडदान करवाने वाले करीब 400-500 पुजारी परिवार हैं। इनके अलावा शहर में भी काफी पुजारी हैं, जो पिंडदान करवाते हैं। इस तरह शहर में लगभग तीन हजार से ज्यादा परिवार हैं, जो इस काम में लगे हुए हैं। कोरोना के कारण लगभग 5 माह से सब कुछ बंद है। अब पिंडदान आदि पूजन कर्म शुरू हो गए हैं, लेकिन यजमान की संख्या काफी कम है।

उज्जैन क्यों माना जाता है मोक्ष का नगर - सिद्धनाथ तीर्थ शिप्रा नदी के तट पर उज्जैन के भैरवगढ़ में है। यहां एक बरगद का पेड़ है। इसे सिद्धवट कहा जाता है। जिस तरह प्रयाग और गया में अक्षयवट है, उसी प्रकार उज्जैन में सिद्धवट है। मान्यता है, इस पेड़ को स्वयं माता पार्वती ने लगाया था। इसी स्थान पर भगवान शिव के पुत्र कार्तिकेय का मुंडन भी हुआ था। स्कंद पुराण के अवंतिका खंड में भी इस तीर्थ का वर्णन मिलता है।

12 ज्योतिर्लिंग में से एक त्र्यंबकेश्वर मंदिर में ब्रह्मा, विष्णु और महेश स्वरूप में तीन शिवलिंग स्थापित हैं। इसी वजह से इस क्षेत्र का महत्व काफी अधिक है।
  • महाराष्ट्रः त्र्यंबकेश्वर में पिंडदान नहीं हो सकेंगे, पुजारियों पर आर्थिक संकट

नासिक के त्र्यंबकेश्वर तीर्थ क्षेत्र के मूल तीर्थ पुरोहित पं. भूषण सांभ शिखरे ने बताया कि इस समय यहां पिंडदान संबंधित सभी तरह के धर्म-कर्म बंद हैं। शासन ने इन कार्यों पर रोक लगा रखी है। पितृ पक्ष में त्र्यंबकेश्वर क्षेत्र में पिंडदान शुरू करवाने के लिए यहां के सभी पुजारी शासन से मांग कर रहे हैं। हर साल पितृ पक्ष में यहां 2 से 3 लाख लोग पिंडदान करने पहुंचते हैं। लेकिन, इस बार हालात बहुत खराब हैं।

200 पुजारी परिवारों के सामने आर्थिक संकट - पं. शिखरे ने बताया कि यहां करीब 200 परिवार सिर्फ पूजन कर्म पर आश्रित हैं। पूजा कराकर जो दान-दक्षिणा मिलती है, उससे ही इनका गुजारा होता है। लॉकडाउन को सभी तरह के पूजन कर्म बंद हैं। पिछले 5 महीनों में जमा पूंजी से काम चल रहा है, वो भी खत्म होने की कगार पर है। अब पितृ पक्ष में अगर पिंडदान शुरू हो जाएंगे तो हमें कुछ राहत मिल सकती है। देशभर में कई जगहों पर मंदिर खोल दिए गए हैं। ऐसे में नासिक ज्योतिर्लिंग भी भक्तों के लिए खोल दिया जाना चाहिए।

त्र्यंबकेश्वर त्रिदेवों का स्थान, इसीलिए महत्वपूर्ण - त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग में ब्रह्मा, विष्णु और महेश के स्वरूप में तीन शिवलिंग स्थापित हैं। ये त्रिदेव हैं, जो सृष्टि की रचना, संचालन और विनाश करने वाले हैं। ये ही पवित्र गोदावरी नदी का उद्गम भी है। यहां पिंडदान के साथ ही कालसर्प दोष की भी खासतौर पर की जाती है। पितृदोष से मुक्ति के लिए दुनियाभर से लोग यहां आते हैं।



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