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बदलाव लाना है तो ज्यादा से ज्यादा टैलेंटेड कलाकारों की फिल्में देखें, चाहे वो इनसाइडर हो या आउटसाइडर, तब हालात जरूर बदलेंगे

पिछले दो महीनों में हिन्दी फिल्म इंडस्ट्री में बहुत उथल-पुथल रही है। इनसाइडर कौन और आउटसाइडर कौन, ये विषय महत्वपूर्ण बन गया है। आज हम कुछ उन आउटसाइडर्स का जिक्र करते हैं, जिन्होंने अपनी प्रतिभा और मेहनत से चमत्कारिक सफलता हासिल की।

ऐसे पहला उदाहरण हैं मुंबई के फिल्मकार चैतन्य तम्हाणे। उनकी दूसरी फिल्म ‘द डिसाईपल’ आई है। यानी शागिर्द। यह सितंबर में होने वाले वेनिस फिल्म फेस्टिवल के कॉम्पिटीशन सेक्शन में चुनी गई है। यह मीरा नायर की ‘मॉनसून वेडिंग’ के बाद दूसरी भारतीय फिल्म है, जो इस श्रेणी तक जा पाई है। फिल्म टोरंटो फिल्म फेस्टिवल में भी दिखाई जाएगी। ‘ग्रैविटी’ और ‘रोमा’ फिल्मों के दिग्गज डायरेक्टर अल्फोंसो क्वोरोन चैतन्य की फिल्म के एग्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर बन चुके हैं।

चैतन्य मिडिल क्लास घर से हैं। इंडस्ट्री से कोई कनेक्शन नहीं है। सिर्फ 17 साल के थे, जब बालाजी टेलीफिल्म्स में डेली सोप लिखना शुरू किया था। फिर 2014 में उनकी पहली फिल्म ‘कोर्ट’ आई। वह बहुचर्चित रही। वे इतने टैलेंटेड हैं कि उनसे कोई नहीं पूछ रहा कि वो कहां से हैं। इनसाइडर हैं कि आउटसाइडर। ‘कोर्ट’ मराठी में थी। उन्होंने इसी भाषा में काम जारी रखा। ‘द डिसाईपल’ भी मराठी में है। फिल्म का सब्जेक्ट हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत है, जो बहुत मुश्किल है।

कहानी है एक शागिर्द की। कई संघर्षों के बावजूद वह जुनून से शास्त्रीय संगीत सीखता है। फिल्म एक विशिष्ट दुनिया दर्शाती है। अमेरिका में तो पता भी नहीं होगा कि कैसे कोई एक राग सीखने में दस साल लगा सकता है।

चैतन्य का सफर महान सफलता की कहानी है। आउटसाइडर कैटेगरी में दूसरी महान सफलता की कहानी दिलजीत दोसांझ की है। उनकी हाल ही में एक एल्बम ‘जीओएटी’ आई है, जिसने नए रिकॉर्ड बनाए हैं। पंजाब के दिलजीत भारत के नंबर वन डिजिटल आर्टिस्ट हैं। गांव से निकलकर वे 18 साल से मेहनत कर रहे हैं।

जब उन्होंने फिल्मों में कदम रखा था तो सबने कहा कि पगड़ी वाला हीरो हिन्दी फिल्में तो दूर, पंजाबी फिल्मों में भी नहीं चलेगा। पर उन्होंने हर मोड़ पर स्टीरियोटाइप तोड़े। दिलजीत हिन्दी सिनेमा में ‘टर्बन हीरो’ का प्रतिनिधित्व करते हैं। ‘गुड न्यूज’ में अक्षय कुमार हीरो थे, पर दिलजीत का भी कोई साइड रोल नहीं था।

जब हम कहते हैं कि सबको बराबर अवसर मिलें, तो वह एक आदर्श विश्व की कल्पना है। वह सबको मिलनी चाहिए, मगर कड़वी हकीकत है कि ऐसा कहीं नहीं है। चाहे फिल्म जगत हो या राजनीति, स्पोर्ट्स या कुछ और। अलबत्ता अगर हम चैतणय तम्हाणे और दिलजीत दोसांझ जैसे उदाहरणों पर नजर डालें और मेहनत से सफलता मिलेगी ही।

आयुष्मान, राजकुमार राव, विनीत कुमार सिंह सब आउटसाइडर्स ही तो हैं। पंकज त्रिपाठी ने एक बार कहा था कि उनके पिताजी मंदिर के पुजारी थे। यह सोचकर वो किसी भी फिल्म को मना नहीं कर सकते, क्योंकि जितने पैसे मिलते हैं, उतने तो उनके पिता महीनों नहीं कमा पाते थे। हालांकि, सभी को बराबर अवसर मिलते हैं, ऐसा नहीं है।

इनसाइडर की बात करें तो मुझे ‘गुंजन सक्सेना’ में जाह्नवी का काम पसंद आया। जहां तक इनसाइडर की फिल्मों को बॉयकॉट करने की जो सोशल मीडिया पर मुहिम चल रही है, वह मेरे ख्याल से सही नहीं है। इसके बजाय एक रचनात्मक बहस होनी चाहिए थी। बेशक नेपोटिज्म समस्या है। मगर यह हर क्षेत्र में है। फिफ्टीज में धरमजी आए। फिर बच्चन साहब आए। शाहरुख रहे। सब आउटसाइडर हैं।

स्टार किड्स के प्रति नफरत का माहौल बना हुआ है। ‘उनकी फिल्में मत देखो’ वाली स्थिति है। मगर क्या इससे हालात सुधरेंगे। बजाय इसके आप अच्छे आर्टिस्ट की फिल्में देखें। उन्हें सपोर्ट करें। मगर ऐसा नहीं होता। बदलाव लाना है तो ज्यादा से ज्यादा टैलेंटेड कलाकारों की फिल्में देखें। हमें अच्छे काम देखने चाहिए। टैलेंट की प्रशंसा करनी चाहिए। चाहे वो इनसाइडर हो या आउटसाइडर। मुझे उम्मीद है कि तब हालात जरूर बदलेंगे। (ये लेखिका के अपने विचार हैं)



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अनुपमा चोपड़ा, संपादक, FilmCompanion.in


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