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नेपाल से सीमा पर जिस 35 किमी जमीन को लेकर विवाद है उसके कई व्यवहारिक हल हैं, लेकिन उन्हें जल्द से जल्द निकाला जाना चाहिए

भारत और नेपाल के बीच एक छोटी-सी सड़क को लेकर काफी कहा- सुनी चल पड़ी है। यह सड़क पिथौरागढ़ और नेपाल की सीमा पर है, जो लिपुलेख के कालापानी क्षेत्र से होती हुई कैलाश मानसरोवर तक जाती है। ज्यों ही कुछ दिन पहले इस कच्ची सड़क को पक्की बनाकर रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने उद्घाटन किया, नेपाल में हड़कंप मच गया। नेपाल की सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी ने भारत विरोधी प्रदर्शन कर दिए। नेपाल ने भारतीय राजदूत से पूछा कि इस नेपाली भूमि पर भारत ने सड़क कैसे बना ली?

सत्तारूढ़ पार्टी के सह अध्यक्ष पुष्पकमल दहल प्रचंड ने यह भी कह दिया कि भारत इन कूटनीतिक कोशिशों से रास्ते पर नहीं आएगा, नेपाल को आक्रामक कार्रवाई करनी होगी। प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली ने तो नेपाल में फैल रहे कोरोना के लिए भारत को जिम्मेदार ठहरा दिया। चीन को नहीं, क्योंकि भारत के सेना प्रमुख एम.एम. नरवणे ने एक संगोष्ठी में कह दिया था कि नेपाल किसी अन्य (चीन) के इशारे पर भारत से उलझ रहा है।

दूसरे शब्दों में 80 किमी की इस नई सड़क को लेकर एक बार दोनों पड़ोसी देश, जिन्हें मैं भातृराष्ट्र (भाईदेश) कहता हूं, फिर उसी कटुता के जाल में फंस जाएंगे, जो हमने 2015 की नेपाल की घेराबंदी के दौरान देखा था।
यह विवाद उस 30-35 किमी जमीन का है, जो हमारी 80 किमी की सड़क का हिस्सा है। यह जमीन भारत, नेपाल और तिब्बत के त्रिकोण पर स्थित है। इस क्षेत्र का इस्तेमाल सैकड़ों वर्षों से तीन देशों के लोग करते रहे हैं। लेकिन, सन् 1816 में भारत की ईस्ट इंडिया कंपनी और नेपाली सरकार के बीच सुगौली संधि हुई, जिसमें नेपाल नरेश ने कहा कि काली नदी के पश्चिम के किसी हिस्से पर नेपाल का अधिकार नहीं है। इसी पश्चिम हिस्से में ही वह विवादास्पद सड़क है। नेपाल के हिस्से में काली नदी का पूर्वी हिस्सा आता है।

अब नेपाल सरकार का कहना है कि सुगौली संधि में जिस काली नदी का उल्लेख है, उसमें उसका पश्चिमी हिस्सा भी शामिल है, जिस पर भारत ने अपना अधिकार जमा रखा है। सन् 2000 में भी नेपाल के प्रधानमंत्री गिरिजाप्रसाद कोइराला ने भारत के प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी से निवेदन किया था कि इसे बातचीत के द्वारा सुलझा लें। दोनों देशों की सीमा निर्धारण के लिए 1981 में जो संयुक्त दल बना था, उसने 98% सीमा तय कर ली थी। सिर्फ कालापानी और सुस्ता के दो मामले रह गए थे।

अब, कैलाश मानसरोवर सड़क का उद्घाटन हुआ है तो नेपाल ने आनन-फानन में नक्शे छाप दिए और उसमें पिथौरागढ़ के क्षेत्रों को अपनी सीमा में दिखा दियाॉ। जब सुगौली की संधि हुई थी तो नेपाल के पास नक्शा छापने की व्यवस्था नहीं थी। ब्रिटिश नक्शों की मनमानी व्याख्याएं समय-समय पर चलती रहीं।

1962 में भारत-चीन युद्ध के बाद नेपाल ने इस सड़क पर दावा ठोंका था, लेकिन इस क्षेत्र पर भारत का ही अधिकार रहा है। 2015 में जब भारत-चीन ने लिपुलेख क्षेत्र से व्यापार मार्ग का समझौता किया था, तब भी नेपाल ने थोड़ा विरोध किया। नेपाल ने यह प्रस्ताव भी 5-6 साल पहले रखा था कि दोनों देशों के विदेश सचिव मामले को हल करें।
अभी भी नेपाली सरकार का आधिकारिक रुख यही है, लेकिन आंतरिक राजनीति मामले को उलझा रही है। नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी के सहप्रधान प्रचंड ने प्रधानमंत्री के.पी. ओली को अपदस्थ करने का अभियान चला रखा है।

पड़ोसी देशों में राष्ट्रवाद को भड़काना हो तो उनका हथियार है- भारत विरोध! भारतीय विदेश मंत्रालय ने कहा है कि कोरोना का समय टलते ही इस सीमा विवाद का हल वह बातचीत से करना चाहता है, लेकिन भारतीय सेनाध्यक्ष नर्वणे के बयान को जमकर उछाला जा रहा है। कहा जा रहा है कि भारतीय सेना में लगभग 60 हजार नेपाली गोरखा जवान हैं। उन पर नर्वणे के बयान का क्या असर होगा?

मेरी राय यह है कि नर्वणे वैसा बयान नहीं देते तो अच्छा होता। नेपाल की कई पार्टियों के नेताओं से मेरी बात हुई। वे जनता के सामने जो चाहे बोलें, लेकिन सबकी राय है कि इस मामले को तूल नहीं दिया जाना चाहिए। मैं कहता हूं कि कोरोना के खत्म होने का इंतजार क्यों किया जाए, दोनों देश तुरंत बात शुरू क्यों नहीं करें?

नेपाल की पूर्व उप प्रधानमंत्री सुजाता कोइराला ने काफी व्यावहारिक सुझाव दिया है। उन्होंने बताया कि नेपाल-बांग्लादेश सीमांत पर भारत का जो फुलबाड़ी क्षेत्र है (18 किमी), यदि भारत उसे नेपाल को लीज़ पर दे दे तो बंगाल की खाड़ी तक पहुंचने में जमीन से घिरे नेपाल को सुविधा हो जाएगी और कालापानी क्षेत्र को भारत नेपाल से लीज पर ले ले तो मामला हल हो जाएगा।

मेरा तो कहना यह है कि नेपाल को यदि हम भाईदेश मानते हैं तो 35 किमी जमीन, जो हमारी ही है, हम अपने पास रखें और उसके बदले में किसी भी सीमांत पर उससे दोगुनी जमीन उसे भेंट कर दें। इसके अलावा भी कई व्यावहारिक हल हो सकते हैं, लेकिन उन्हें जल्द से जल्द निकाला जाना चाहिए।
(यह लेखक के अपने विचार हैं)



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डॉ. वेदप्रताप वैदिक, भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष हैं।


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